बहुत बड़ी आशा की खबर – नवीनतम शोधों से पता चलता है कि मधुमेह के कारण होने वाले गुर्दें की खराबी को काफी हद तक टाला जा सकता है।

इसके लिए आपको इन उपायों को अमल करना होगा:

शुरुआतीदौर से ब्लड-सुगर का कठोर नियंत्रण करें। यह सही खान-पान उपयुक्त व्यायाम, दवाइयाँ एवं इन्सुलीन के उचित प्रयोग द्वारा संभव है।
अपना वजन घटाएं।
नमक कम खाएं।
नियमित व्यायाम करें।
शराब न पीये और धुम्रपान न करें।
चिकित्सक के परामर्श के बाद एस -इन्हीबीटर ग्रुप की दवा का नियमित प्रयोग करे।
हर हाल में अपना रक्त-चाप 120 से 80 के नीचे रखें। उच्च रक्तचाप का रहना मधुमेह के मरीजों में किडनी फेल्यर का महत्वपूर्ण कारण है।
एक शोध के अनुसार टाइप-1 डायबिटीज के जिन मरीजों का रक्तचाप सामान्य रखा गया उनकी ज्यादा दिन जीने की उम्मीद 45% से 94% तक बढ़ गयी। डायलायसिस एवं ट्रांसप्लान्ट्शन की दर 73% से 31% घट गयी।
माइक्रोअल्बुमिनुरिया

क्या है माइक्रोअल्बुमिनुरिया?

‘माइक्रल टेस्ट’ एक स्क्रीनींग टेस्ट है, इसे करना बहुत सरल है।

‘रिएजेंट स्ट्रीप’ माइक्रल टेस्ट द्वारा इसे सधारणतः किया जाता है। पेशाब में अल्बुमीन(प्रोटीन) की कितनी मात्रा निकल रही है, यही इसमें देखा जाता है।

24 घंटे में सामान्य आदमी में 30 मि.ग्रा. से कम अल्बुमीन पेशाब में निकलता है। यदि आपके पेशाब में 24 घंटे में 30 मि.ग्रा. से ज्यादा अल्बुमीन जा रहा है तो माइक्रल टेस्ट पॉजीटीव आता है। स्ट्रीप टेस्ट से यदि पॉजीटिव रिजल्ट आता है तो इसे अन्य स्पेशिफिक जाँच द्वारा निश्चित करना जरुरी है।

यदि आपको माइक्रोअल्बुमिनुरिया की अवस्था शुरु हो गयी है तो तुरंत सावधानी की जरुरत है। इस समय से भी यदि इन उपायों का आप अनुसरण करें तो किडनी फेल्यर से बचने की काफी संभावना रहती है:

i. शुरुआती दौर से ब्लड-सुगर का कठोर नियंत्रण करें। यह सही खान-पान उपयुक्त व्यायाम, दवाइयाँ एवं इन्सुलीन के उचित प्रयोग द्वारा संभव है।
ii. अपना वजन घटाएं।
iii. नमक कम खाएं।
iv. नियमित व्यायाम करें।
v. शराब न पीये और धुम्रपान न करें।
vi. चिकित्सक के परामर्श के बाद एस -इन्हीबीटर ग्रुप की दवा का नियमित प्रयोग करे।
vii. हर हाल में अपना रक्त-चाप 120 से 80 के नीचे रखें। उच्च रक्तचाप का रहना मधुमेह के मरीजों में किडनी फेल्यर का महत्वपूर्ण कारण है।

छह माह में तीन बार किये गए पेशाब की जाँच में यदि दो बार माइक्रोअल्बुमिनुरिया मिले तभी यह निश्चित होता है कि यह पैथोलाजिकल है। केवल एक बार स्कारात्मक हो तो यह समान्य कारणों से भी हो सकता है।

माइक्रोअल्बुमिनुरिया का पता होते ही खास उपायों के द्वारा इस अवस्था को रोका जा सकता है। इस टेस्ट के साकारात्मक होने का मतलब है कि आपको भविष्य में किडनी की खराबी की संभावना है।
मधुमेह में किडनी

मधुमेह और भारत में किडनी का फेल होना

किडनी फेल्यर के 30% मामलों में कारण है मधुमेह यानी डायबेटिक नेफरोपैथी।
टाइप-2 मधुमेह के महामारी के तौर पर बढ़्ने और एसे मरीजों की आयु में वॄद्धि के कारण अब ज्यादा किडनी फेल्यर के मामले भारत में हो रहे हैं, यह भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक संकट है।
किडनी ट्रांसप्लांट यानी गुर्दा प्रत्यारोपण का प्रारंभिक खर्च ढ़ाई लाख रुपये एवं प्रतिवर्ष दवाइयों पर खर्च एक लाख दस हजार आता है, इन दवाइयों के इस्तेमाल के बिना ट्रांसप्लांट शरीर में नहीं टिक सकता है।
लगातार यदि गुर्दे की खराबी से गुजर रहे मरीज हिमोडायलायसिस पर रखे जायें तो सलाना दो लाख का खर्च आयेगा।
यदि किडनी फेल्यर के मरीज को सी.ए.पी.डी.(पेरीटोनीयल डायलायसिस) पर रखा जायें तो सलाना खर्च दो लाख साठ हजार आता है।
प्रश्न यह है कि क्या मधुमेह के कारण होने वाले ‘किडनी फेल्यर ‘ को रोका जा सकता है, अधिकांश मामलों में – हाँ।

मधुमेह के मरीजो में किडनी फेल होने का रिस्क।

सामान्यत :5 से 15 साल की अवधि तक आप मधुमेह से ग्रसित हों।
जेनेटिक कारणों से।
उच्च रक्तचाप नियंत्रित न हो।
ब्लड सुगर नियंत्रित न हो।
यदि आप साथ में धूम्रपान कर रहें हो।

इस कहानी को सिरियसली समझिए

गुर्दे शरीर के महत्वपूर्ण अंग हैं। शरीर में उत्पन्न खराब तत्वों को गुर्दे ही निकालते हैं। गुर्दे की खराबी यानी किडनी फेलयोर अत्यंत खतरनाक अवस्था है। मधुमेह के दुष्परिणाम के कारण गुर्दों की खराबी आम बात होती जा रही है। टाइप-2 मधुमेह यानि वह मधुमेह जो 40 की उम्र के आस-पास होता है, उससे मरीजों होने की संख्या तो बढ रही है, अच्छी चिकित्सा के कारण अब मरीज अब ज्यादा दिन तक जिन्दा रहते हैं। गुर्दें मधुमेह में प्रायः तुरंत खराब नहीं होते। ज्यादा दिन जिन्दा रहने के कारण गुर्दें की खराबी के ज्यादा मरीज मिल रहे हैं। अब मधुमेह के रोगियों में गुर्दा प्रत्यारोपण की चिकित्सा(ट्रान्सप्लान्टेशन) संभव हो गयी है।

प्रायः 20 से 30 प्रतिशत मधुमेह के रोगियों में गुर्दे की खराबी यानि नैफरोपैथी हो जाती है मगर ज्यादा टाइप बन के मरीज ही पूर्णतः किडनी के फेल्योर की अवस्था से गुजरते हैं। टाइप टू के मरीज नैफरोपैथी होने पर भी पूरी तरह किडनी फेलयोर से नहीं गुजरते हैं।

यह जानना अत्यंत सुखद एवं महत्वपूर्ण है

यह जानना अत्यंत सुखद एवं महत्वपूर्ण है कि नये शोधों से यह पता चला है कि मधुमेह के रोगियों में नैफरोपैथी की अवस्था को रोका या टाला जा सकता है, बशर्ते कि सही समय पर जांच द्वारा इसका पता कर लिया जाये।

क्लिनिकल तौर पर पेशाब जांच में माइक्रो- अल्बुमिनुरिया की जांच से यह पता चलता है कि गुर्दो में नेफरोपैथी की अवस्था होने जा रही है । यदि पेशाब में 24 घंटे में 30 मि ग्रा से 300 मि. ग्रा. तक अल्बुमीन निकले तो इसे माइक्रो अल्बुमिनुरिया कहते हैं। सामान्य आदमी में 30 मि.ग्रा से कम अल्बुमीन 24 घंटे में पेशाब में निकलता है। यदि 24 घंटे में 300 मि. ग्रा. से ज्यादा अल्बुमीन निकले तो इसे क्लिनिकल अल्बुमीनुरिया कहते हैं।

कई मरीजों में जब पहली बार मधुमेह रोग का पता चलता है तो वस्तुतः रोग उन्हें कई सालों से लगा रहता है। लक्षणों के अभाव में वे जांच नहीं कराते हैं इसलिए देरी से बीमारी का पता चलता है। तब तक उन्हें नैफरोपैथी की अवस्था भी हो जाती है।

माइक्रो- अल्बुमिनुरिया होने के बाद 20-40 प्रतिशत रोगी बिना किसी विशिष्ट चिकित्सा के क्लिनिकल नेफरोपैथी की अवस्था में चले जाते हैं।

यह बहुत जरूरी है

क्लिनिकल अल्बुमीनुरिया यह भी बताती है कि मरीज को हृदयआघात होने की संभावना ज्यादा हो गयी है। इसीलिए यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि टाईप- टू मधुमेह रोगी को माइक्रो-अल्बुमीनुरिया के स्टेज में जांच द्वारा पता कर लिया जाये और जरुरी बचाव के उपाय शुरू कर दिये जायें।
अल्बुमीनुरिया की जांच
पेशाब के सामान्य जांच में यदि अल्बुमीन नहीं है तो माइक्रो अल्बुमीनुरिया की जांच माइक्रल टेस्ट द्वारा करावें। (सुबह का पेशाब इस जांच के लिए उत्तम है।)

बचाव एवं देखभाल यूं की जाती है

* ब्लडसुगर को बिल्कुल सामान्य रखें:

इससे माइक्रो अल्बुमीनुरिया या बढी हुई नेफरोपैथी। की अवस्था को टाला जा सकता है। यह पता चला है विश्व में हुई इन महत्वपूर्ण शोधों से –
डीसीसीटी (डायबीटीज कनट्रोल एवं कम्पलीकेशन ट्रायल), यू केपीडीएस (यूनाइटेड किंगडम प्रोस्प्रेक्टिभ डायबीटीज स्टडी), स्टोकहोम इन्टरवेन्शन स्टडी, कुआमाटो स्टडी।

उच्च रक्तचाप का नियंत्रण

अगर मधुमेह के रोगी तो थोड़ा भी उच्च रक्तचाप है तो नेफरोपैथी होने की संभावना बढ जाती है। रक्तचाप को नियंत्रित कर हम उनका जीवन दीर्घ कर सकते हैं। टाइप वन मधुमेह में मरणदर को 94 प्रतिशत से घटाकर 45 प्रतिशत तक किया जा सकता है यदि रक्तचाप नियंत्रित किया जाये।
18 साल से ज्यादा के रोगियों में सिस्टोलिक रक्तचाप 130 एवं डायस्टोलिक 80 से कम रखने की हिदायत दी जाती है।

जो दवा सबसे महत्वपूर्ण है गुर्दो को बचाने में और जिसका इस्तमाल जिन्हें उच्च रक्तचाप नहीं है उन्हें भी करने की हिदायत दी गयी है, वह है ऐस इन्हीबीटर ग्रुप की (इनाप्रील, लिसिनोप्रील,ओलमीसारटन,टेलमीसारटन, आदि); इन दवाओं का इस्तेमाल अपने चिकित्सक के परामर्शॆ के बाद ही करें।

* भोजन में प्रोटीन की मात्रा कम करें:

पहले के हुए शोधों के अनुसार (जानवरों में) प्रोटीन कम देने से गुर्दों में इनट्राग्लोमेरुलस प्रेशर कम पाया गया एवं नेफरोपैथी से बचाव की संभावना उजागर हुई है।(0.6 ग्राम प्रति के. जी. प्रतिदिन की मात्रा) नये शोधों के प्रकाश में बढी नेफरोपैथी हुई की अवस्था में 0.8 ग्राम प्रति.के.जी. प्रतिदिन के हिसाब से प्रोटीन देने की बात कही गयी है।

स्मरणीय

मधुमेह गुर्दो की खराबी का महत्वपूर्ण कारण है।
मधुमेह में गुर्दो की खराबी को बचाया जा सकता है। इसे बढ़ने से रोका जा सकता है।
माइक्रोअल्बुमीनुरिया से क्लिनिकल अब्लुमीनुरिया को पकड़ना जरूरी है ताकि सही कदम उठाया जा सके।
मधुमेह में गुर्दो को कैसे बचाया जाए इसपर रोगी को शिक्षित करने की आवश्यकता है।
सही समय पर गुर्दो की खराबी को दर्शाने वाले जांच नियमित रुप से कराते रहना चाहिए।